Jagannath Temple Puri: स्थापना से लेकर चमत्कारों के रहस्य तक

Jagannath Temple Puri: उड़ीसा जिले के पुरी में स्थित भगवान श्री कृष्ण का जगन्नाथ मंदिर उन मंदिरों में से एक है जो आज के विज्ञान को खुली चुनौती देते हैं। क्योंकि इस मंदिर के रहस्य को वैज्ञानिक और बड़े बड़े बुद्धिमान भी सुलझा नहीं पाए हैं।

पूरी में स्थित जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां पर भगवान श्री विष्णु जी के अवतार श्री कृष्ण, श्री बलराम और बहन सुभद्रा जी साक्षात विराजमान है। लाखों लोग यहां पर के दिन भगवान के दर्शन करने आते हैं।

अब आप सोचेंगे कि यह तो सामान्य बात है भारत में लाखों करोड़ों मंदिर हैं और उन मंदिरों में रोज लोग जाते हैं। लेकिन हम आपको बता दें भगवान जगन्नाथ के मंदिर में भगवान के दर्शन के साथ-साथ उन चमत्कारों के भी दर्शन होते हैं जिन्हें आजकल के मॉडल लोग और साइंस दोनों ठुकरा देते हैं।

वे चमत्कार कुछ इस प्रकार हैं

1. वायु की विपरीत दिशा में मंदिर के झंडे का लहराना
2. मंदिर के ऊपर लगा सुदर्शन चक्र किसी भी दिशा से देखने पर सामने ही दिखाई देता है
3. मंदिर के सिंहद्वार के अंदर प्रवेश करते ही समुद्र की ध्वनि सुनाई देना बंद हो जाती है
4. मंदिर की ऊंचाई 214 फिट है लेकिन इसके बाद भी इसके परछाई जमीन पर नहीं पड़ती
5. मंदिर के ऊपर आज तक ना कोई पंछी उड़ता देखा गया ना  बैठता
6. जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद को सात बर्तनों में एक के ऊपर एक रखकर पकाया जाता है और आश्चर्य की बात यह है कि सबसे ऊपर वाला बर्तन में रखा खाना सबसे पहले पकता है।
7. 1 दिन में एक लाख लोग पहुंचे या 10 लाख प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता और ना ही कभी व्यर्थ होता है।

इन सभी रहस्य के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे। लेकिन हम पहले यह जान लेते हैं कि इस चमत्कारी और अद्भुत मंदिर की स्थापना कैसे और कब हुई क्योंकि इसके बाद ही आप इस मंदिर के चमत्कारों को समझ पाएंगे।

Jagannath Mandir की स्थापना

बात उस समय की है जब मालवा के राजा इंद्रद्युम्न कुछ सपने में श्री विष्णु जी के दर्शन हुए और उन्होंने राजन से कहा कि पूरी में तुम मेरा एक मंदिर बनवाओ। मंदिर में मूर्तियों के लिए द्वारका से एक पेड़ का भाग बहकर समुद्र के जरिए पूरी की तरफ आ रहा है। कल सुबह समुद्र तट पर जाकर देखना तो तुम्हें वहां पर वह पेड़ का टुकड़ा मिल जाएगा। उससे तुम मूर्तियां बनवा कर मंदिर में स्थापित कर देना।

राजा इंद्रद्युम्न अगले दिन सुबह उठे और अपने सैनिकों के साथ पुरी के समुद्र तट किनारे पहुंच गए और वहां पर उन्हें एक लकड़ी का टुकड़ा तैरता हुआ मिला। लकड़ी के टुकड़े को मंदिर तक लाया गया। इसके इसके बाद राजा ने बिना देर किए अपने राज्य के कुशल कारीगरों को बुलाया और मूर्ति गिरने का आदेश दिया।

कारीगरों ने अपने छेनी हथौड़ी लेकर लकड़ी के टुकड़े पर वार करना शुरू किया लेकिन उनका एक भी बार लकड़ी पर एक खरोच भी ना लगा सका। जो देखकर सब आश्चर्यचकित हो गए। अंत में सब थक कर बैठ गए इसी बीच एक बूढ़ा आदमी आया और उसने राजा से कहा कि वह मूर्तियां बना सकता है।

पहले तो किसी को भी उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन राजा ने उस पर विश्वास दिखाते हुए पूछा कि वह कैसे इस मूर्ति को बनाएगा। इस पर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा कि वह मूर्ति को 21 दिनों में बनाकर तैयार कर देगा लेकिन इस दौरान ना ही कोई उससे बात करेगा और ना ही मूर्ति बनते देखने की कोशिश करेगा।

यह बात सुनकर सभी सोच में पड़ गए लेकिन कोई और उपाय ना होने के कारण राजा ने उस बूढ़े व्यक्ति को एक बड़ा सा कक्ष दे दिया और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया गया। इसके बाद मूर्ति गढ़ने की आवाज आने लगी। सभी को अब विश्वास हो गया कि वह व्यक्ति मूर्ति बना रहा है।

अधूरी रह गयी मूर्तियां

कुछ दिन बीतने के बाद एक बार राजा इंद्रद्युम्न की रानी उस कक्ष के बाहर पहुंची और मूर्ति गढने की आवाज सुनने की कोशिश करने लगी। लेकिन उन्हें कोई आवाज नहीं सुनाई दी। इसके बाद उन्होंने यह बात राजा को बताई और सभी को यह चिंता हो गई, कहीं उस बूढ़े व्यक्ति को कुछ हो तो नहीं गया। और राजा ने अपने वादे को तोड़ते हुए सैनिकों को आदेश देकर दरवाजा खुलवा दिया।

Jagannath Temple Murti

कक्ष का दरवाजा खुलते ही वह बूढ़ा व्यक्ति अदृश्य हो गया और सभी को सामने तीन अधूरी मूर्तियां मिली। यह तीन मूर्तियां थी श्री कृष्ण, श्री बलराम और श्री सुभद्रा जी की। लेकिन यह मूर्तियां पूरी नहीं बनी थी।

कृष्ण जी और बलराम जी के अधूरे हाथ बने हुए थे और पैर नहीं बने थे जबकि बहन सुभद्रा जी के हाथ-पैर दोनों बनने बाकी थे। सभी को यह देख कर पछतावा हुआ। लेकिन बाद में सभी ने इसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया और राजा ने मंदिर में तीनों मूर्तियों को विधिवत पूजन करके स्थापित करा दिया।

इसके बाद से कई भक्तों के कष्टों को भगवान ने दूर किया और दर्शन भी दिए और अब वह चमत्कार होने शुरू हो हुए जिनके बारे में ना किसी ने सोचा था ना ही किसी ने पहले कभी देखा था।

Jagannath Dham के चमत्कार

Jagannath temple flag:- जगन्नाथ मंदिर के ऊपर फहराता ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में उड़ता है। वैज्ञानिक भी इस के रहस्य को अभी तक नहीं सुलझा पाए हैं।

हवा:- यहां पर हवा समुद्र से जमीन की तरफ नहीं बल्कि जमीन से समुद्र की तरफ बहती है।

Jagannath Temple Chakra And Flag

समुद्र की ध्वनि:- Jagannath Mandir के सिंहद्वार के अंदर प्रवेश करते ही समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देना बंद हो जाती है।

नीलचक्र:- मंदिर के ध्वज के साथ लगा निलचक्र को चारों दिशाओं में से किसी भी दिशा में खड़े होकर देखा जाए वह सामने ही दिखाई देता है। आज तक किसी ने भी इसका साइड लुक नहीं देखा है।

नहीं उड़ते पंछी:- किसी भी बड़े मंदिर या फिर ऊंची इमारत के ऊपर अक्सर पंछियों को उड़ते या फिर बैठे हुए देखा जा सकता है। लेकिन भगवान जगन्नाथ के इस मंदिर पर आज तक ना ही कोई पंछी उड़ता हुआ देखा है ना ही बैठता हुआ।

जगन्नाथ जी का प्रसाद:- भगवान जगन्नाथ जी के प्रसाद का स्वाद तो अलग है ही। लेकिन इसे पकाने की विधि भी एकदम अलग है। प्रसाद को सात लकड़ी के बर्तनों पर एक के ऊपर एक रखकर पकाया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि सबसे ऊपर बर्तन में रखा प्रसाद पहले पकता है और सबसे नीचे आग के पास रखा प्रसाद सबसे आखिर में पकता है।

प्रसाद नहीं पड़ता कम:- कई बार ऐसा होता है जब भारी संख्या में भक्त पहुंचते हैं तो प्रसाद कम पड़ जाता है। लेकिन भगवान जगन्नाथ के मंदिर का प्रसाद ना कभी कम पड़ता है और ना ही कभी व्यर्थ होता है।

हनुमान जी करते हैं रक्षा

संकट मोचन महाबली हनुमान के बारे में आखिर कौन नहीं जानता है। यही एकमात्र ऐसा भगवान है जो त्रेता, द्वापर और कलयुग तीनों युगों में साक्षात हैं। रामायण में हनुमान जी का वर्णन तो मिलता ही है लेकिन महाभारत में भी हनुमान जी का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार जगन्नाथ धाम से भी हनुमान जी कि कई कथाएं जुड़ी हुई है।

Jagannath-Temple-Sri-Hanuman Temple

जगन्नाथ धाम में हनुमान जी की चार अलग-अलग रूप में चार अलग-अलग दिशाओं में पूजा होती है।

1. बेड़ी हनुमान
2. कानपटा हनुमान
3. बड़े भाई हनुमान
4. अष्टभुजा हनुमान

आज भी समुद्र देव को रोके हुए हैं हनुमान जी?

समुद्र किनारे बसे गांव और शहरों को हरदम यह दर्द रहता है कि कहीं कोई सुनामी या चक्रवात ना आ जाए। लेकिन पूरे के लोगों में यह डर नहीं है क्योंकि उन्हें अपने प्रभु भगवान जगन्नाथ पर पूरा विश्वास है और हो भी क्यों ना हजारों वर्षों से आज तक समुद्र की लहरें मंदिर तक नहीं पहुंच पाई हैं।

एक कथा के अनुसार जब मंदिर की स्थापना होने के बाद समुद्र देव जगन्नाथ जी के दर्शन करने के लिए बहुत उतावले थे और वो मंदिर की तरफ बढ़ने लगे। इस वजह से काफी नुकसान हुआ और मंदिर पर लगा सुदर्शन चक्र भी टूटकर गिरने लगा। लेकिन हनुमान जी ने उस चक्र को अष्टभुजा धारण करके रोक लिया। इसलिए हनुमान जी की पूजा जगन्नाथ धाम में उत्तर दिशा में अष्टभुजा हनुमान के रूप में की जाती है।

हनुमान जी के कारण समुद्र की आवाज मंदिर के अंदर नहीं सुनाई देती

कहते हैं एक बार समुद्र की लहरों की आवाज की वजह से भगवान जगन्नाथ आराम नहीं कर पा रहे थे यह बात जब नारद जी को पता चली तो उन्होंने हनुमान जी से बताया। यह बात सुनकर हनुमान जी काफी क्रोधित हो गए। इसे देखकर समुद्र में प्रकट हुए। हनुमान जी ने उनसे लहरों की ध्वनि को नियंत्रित करने को कहा। लेकिन समुद्र देव ने कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकते हैं क्योंकि ध्वनि तो वायु के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाती है।

इसके बाद हनुमान जी ने वायु देव को याद किया और वह प्रकट हुए। उनसे हनुमान जी ने कहां की वह समुद्र की लहरों की आवाज को मंदिर तक ना पहुंचने दे। लेकिन पवन देव ने कहा कि यह तो वायु और ध्वनि के प्रकृति है इसे कोई नहीं बदल सकता।

इसके बाद हनुमान जी ने अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए मंदिर के चारों और ऐसा घेरा बना दिया। जिसके अंदर समुद्र की लहरों की तेज ध्वनि ना जा सके। हनुमान जी के इस रूप को पश्चिम दिशा में कानपटा हनुमान के रूप में पूजा जाता है।

Puri-Hanuman-Mandir

बेड़ी हनुमान:- हनुमान जी के रहते हुए समुद्र देव मंदिर तक नहीं पहुंच पाते लेकिन जब भी हनुमान जी भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए पहुंचते तो समुद्र देव भी उनके पीछे-पीछे मंदिर की तरफ बढ़ने लगते। इससे परेशान होकर हनुमान जी ने भगवान जगन्नाथ को यह बात बताई और उन्होंने हनुमान जी को वरदान दिया कि तुम पुरी के हर कण में वास करोगे और हनुमान जी को श्री राम नाम की बेड़ियों से बांध दिया। जिससे वे एक ही जगह पर रुके रहे हैं और समुद्र देव आगे ना बढ़े। हनुमान जी के इस रूप की पूजा पूर्व दिशा में जगन्नाथ धाम में होती है।

बड़े भाई हनुमान:- जगन्नाथ धाम में सभी भक्ति में डूबे रहते थे एक बार हनुमान जी ने देखा कि दर्शन करने आए भक्त भगवान के दर्शन करने के बजाए मोह माया में पड़ रहे हैं। हनुमान जी ने इसका कारण जानने की कोशिश की और उन्हें पता चला कि कामदेव की वजह से यह सब कुछ हो रहा है। हनुमान जी ने कामदेव को जगन्नाथ धाम छोड़कर चले जाने को कहा लेकिन वह तैयार नहीं हुए। इसके बाद हनुमान जी ने कामदेव को युद्ध करके हारा दिया और जगन्नाथ धाम हमेशा के लिए छोड़ जाने को कहा। हनुमान जी के इस रुख की पूजा जगन्नाथ में दक्षिण दिशा में होती है।

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निष्कर्ष:- आज इस पोस्ट में हमने भगवान जगन्नाथ के बारे में जाना। हमने पढ़ा कि भगवान जगन्नाथ के मंदिर की स्थापना किसने और कब की थी। इसके साथ ही मंदिर के अद्भुत रहस्य कौन-कौन से हैं और उनके पीछे का कारण क्या है।

Akki

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